मंत्री ने कहा कि सुल्तान, एक उल्लू दूसरे उल्लू से अपनी संतान की शादी की बात कर रहा है. दूसरा उल्लू जानना चाहता है कि दहेज में उसे कितने निर्जन गांव मिलेंगे.
मंत्री ने कहा कि उल्लू कह रहा है कि जब तक सुल्तान ज़िंदा है, निर्जन गांवों की कोई कमी नहीं है. बताते हैं कि मंत्री की इस बात का सुल्तान पर बहुत गहरा असर हुआ और उन्होंने अपनी तलवार म्यान में डाल दी.
आज भी दी जाती है उल्लुओं की बलि
उल्लू को एक ओर जहां बहुत से लोग मूर्ख मानते हैं वहीं बहुत से लोगों के लिए वो एक समझदार पक्षी है. जो लोग मांसाहारी हैं, वो भी कभी उल्लू का मांस खाने के बारे में नहीं सोचते. लेकिन दिवाली आते ही उल्लुओं की बलि का बिगुल बज उठता है.
आप मानिए या न मानिए लेकिन काली पूजा के लिए आज भी उल्लुओं की बलि दी जाती है.
इस दौरान उल्लुओं की ऊंची कीमत लगती है. तीस हज़ार का एक उल्लू. दिल्ली में तो बहुत से दुकानदार ऐसे भी मिल जाएंगे जो एक उल्लू को पचास हज़ार में बेचने की कसम खाकर दुकान में खड़े होते हैं जबकि खुद उन्होंने उस उल्लू को जयपुर या मेरठ जैसी जगहों से महज़ तीन सौ या चार सौ में ख़रीदा होता है.
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तीन सौ के उल्लू की क़ीमत तीस हज़ार होने के पीछे एकमात्र कारण अंधविश्वास है. ऐसी मान्यता है कि लक्ष्मी पूजा की रात उल्लू की बलि देने से अगले साल तक के लिए धन-धान्य, सुख-संपदा बनी रहती है.
उल्लुओं की ख़रीद और बिक्री का ज़्यादातर बाज़ार राजस्थान और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है जहां 'कलंदर' उन्हें पकड़ते हैं.
ये लोग मुख्य तौर पर जयपुर, भरतपुर, अलवर और फ़तेहपुर सिकरी के अंदरूनी ग्रामीण इलाक़ों में रहते हैं. कोराई-करावली गांव उल्लू के गुप्त व्यापार के लिए देशभर में कुख्यात हैं. मथुरा के पास कोसी-कलां भी इसके लिए जाना जाता है.
कुछ आदिवासी, मुख्य तौर पर बहेलिया लोग छोटे उल्लुओं को पकड़ते हैं और उनका प्रजनन कराते हैं ताकि दिवाली के मौके पर उन्हें ऊंचे दामों पर बेचा जा सके.
उस वक्त पकड़ा गया एक नन्हा उल्लू बेचे जाने तक बड़ा हो चुका होता है. उल्लू के शरीर के हर हिस्से की अपनी क़ीमत होती है. चाहे वो चोंच हो, उसके पंजे हों, उसकी खोपड़ी हो, आंख हो चाहे उसका मांस. उसके शरीर के हर हिस्से का इस्तेमाल तांत्रिक पूजा के लिए किया जाता है.
अंधविश्वास की हदें
अमावस्या की रात को होने वाली तांत्रिक पूजा में कुछ लोग उल्लू की बलि देते हैं.
जो शख़्स पूजा करता है, उसे तथाकथित काले जादू में दक्षता रखने वाला कोई तांत्रिक दिशा-निर्देश देता रहता है. उसे शारीरिक संबंध नहीं बनाना होता है, शरीर पर मौजूद सभी अनचाहे बालों को हटाना होता है और मध्यरात्रि में नहाना होता है.
उसके बाद उसे एक सफ़ेद धोती लपेटनी होती है लेकिन शरीर का ऊपरी हिस्सा नग्न ही रखना होता है. इसके बाद उस शख़्स को आंखें बंद करके बैठ जाना होता है.
सामने बैठा तांत्रिक मंत्रों का जाप शुरू करता है. तांत्रिक क्रियाएं अलग-अलग तरह की होती हैं. कभी किसी लड़की (जिसे अभी-अभी पीरियड्स होने शुरू हुए हैं) के इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड को उल्लू के चारों ओर लपेटकर जलाया जाता है तो कभी किसी नव-विवाहित महिला के पेटिकोट (साड़ी के अंदर पहने जाना वाला वस्त्र) से.
माना जाता है कि अगर कोई महिला उत्सुकतावश इसकी झलक भी देख लेगी तो वो ज़िदगीभर के लिए बांझ हो जाएगी और अगर कोई बच्चा इस तांत्रिक क्रिया को देख लेता है तो वो अकाल मौत मर जाएगा.
मुग़लों ने भी दी थी बलि?
उत्तर प्रदेश के इब्राहिमपट्टी में जन्मे इब्राहिम भाई के अनुसार, उल्लू की बलि से बहुत से तांत्रिक क्रियाएं जुड़ी हुई हैं. उल्लू वैभव की देवी लक्ष्मी का वाहन है और लोग जल्द से जल्द पैसा कमाना चाहते हैं ऐसे में लोग वो सबकुछ करते हैं जो तांत्रिक उन्हें करने को कहता है.
राजस्थान के धौलपुर के एक पुराने बाशिंदे का दावा है कि जिस समय मुग़ल वंश ख़त्म हो रहा था उस दौरान भी उल्लुओं का बलि दिए जाने से जुड़े कुछ सुबूत मिलते हैं.
वो मोहम्मद शाह रंगीला और उनसे भी पहले मइज़ुद्दीन जहांदार शाह और मोहम्मद फर्रुकसेयर का ज़िक्र इस संबंध में करते हैं. वो लाल कंवर का ज़िक्र करते हुए बताते हैं, वो शुरू में विवाहित नहीं थीं लेकिन आगे चलकर जहांदार शाह ने उन्हें बेगम इम्तियाज़ महल बना दिया और उनके भी पीरियड्स के दौरान के कपड़ों का इस्तेमाल तंत्र के लिए किया गया था.
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